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बुधवार, 13 अप्रैल 2011

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       ऋतेष       
 ( 9407658285)      
दुर्ग, छत्तीसगढ़        
   RITESH TIKARIHA  

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                                       thanx....
                                 ok then
                                                


                      
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शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

Dhini & Anna is our actual hero

Anna & Dhoni hai hamare real leader

               http://www.msdhoniclub.com/wp-content/uploads/2010/03/MS-Dhoni-Wallpaper-3.jpg

जन लोकपाल बिल लाने के लिए आंदोलन कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे के समर्थन में पूरा देश उठ खड़ा हुआ है। सामाजिक कार्यकर्ताओं, उद्योगपतियों से लेकर स्‍कूली छात्र-छात्राएं, युवा, नौकरीपेशा, बुजुर्ग, महिलाएं और बॉलीवुड की नामचीन हस्तियां भी उनके समर्थन में आवाज उठाने लगी हैं।
उद्योगपतियों पवन मुंजाल और राहुल बजाज ने भी अन्‍ना हजारे का समर्थन किया है। बजाज ने कहा, 'मुझे अन्‍ना पर सरकार के किसी मंत्री से ज्‍यादा भरोसा है।' पवन मुंजाल ने कहा, 'अब समय आ गया है कि हम भ्रष्‍टाचार के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करें।‘
बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्‍चन ने ट्विटर पर जारी ताजा संदेश में कहा है, 'देश हित में जो भी कार्य हो, उसमें हमारा समर्थन हमेशा रहा है और हमेशा रहेगा।'  बॉलीवुड के मशहूर निर्माता निर्देशक महेश भट्ट ने ट्विटर पर जारी संदेश में कहा है, 'यदि आप अन्‍ना हजारे और उनके आंदोलन में यकीन रखते हैं तो याद कीजिए कि महात्‍मा गांधी ने क्‍या कहा था- अहिंसा की राह पर चलने वालों का कोई दुश्‍मन नहीं होता।'

अन्‍ना को समर्थन की आमिर की अपील पर भारतीय टीम के कप्‍तान महेंद्र सिंह धोनी ने ट्विटर पर भेजे अपने संदेश में कहा, ‘मैं आमिर खान से सहमत हूं। अन्‍ना हजारे को भारतीय क्रिकेट टीम से ज्‍यादा समर्थन मिलना चाहिए। कृपया हजारे को अपना समर्थन दें।’
आमिर खान ने कहा था कि भ्रष्टाचार के विरोध में मजबूत कानून लाए जाने को लेकर अन्ना हजारे को वर्ल्ड कप जीतने वाली टीम इंडिया से ज्यादा समर्थन की जरूरत है। गत 6 अप्रैल को अन्ना को लिखी गई चिट्ठी में आमिर ने उन्हें युवाओं के लिए आदर्श बताया है। आमिर ने प्रधानमंत्री को भी चिट्ठी लिखकर अन्ना की मांग को मानने की अपील की।

गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्विटर पर जारी संदेश में कहा, 'नवरात्रि के दौरान मां कामाख्‍या के दर्शन होने का सौभाग्‍य प्राइज़ हुआ है। अन्‍ना हजारे के बेहतर स्‍वास्‍थ्‍य की कामना की।'
बॉलीवुड अभिनेत्री बिपाशा बसु ने ट्विट किया है, 'अन्‍ना हजारे हमलोगों (भारत की जनता) के लिए खड़े हुए हैं इसलिए हमें उनका समर्थन करना चाहिए।'
बॉलीवुड अभिनेता अनुपम खेर का कहना है, 'आईपीएल में हिस्‍सा ले रहे सभी खिलाडियों और इन मैचों को देखने वाले क्रिकेटप्रेमियों से अपील करता हूं कि वो अन्‍ना हजारे के आंदोलन को समर्थन दें। जब कोई भ्रष्टाचार से लड़ा रहा हो तो मैं उनके तरीकों को जज नहीं करता। मैं उनके उद्देश्य और कार्यों की सराहना करता हूं। मैं अन्ना हज़ारे के साथ हूं। क्या आप हैं?'
बॉलीवुड अभिनेता शेखर कपूर का कहना है, 'सचिन, धोनी या आमिर नहीं, बल्कि आम आदमी को खड़े होना चाहिए और कहना चाहिए, नहीं! मैं अब और नहीं सहूंगा। और तब क्रांति हो पाएगी। मैं लोकपाल बिल पर राष्ट्रीय बहस कराए जाने के लिए अन्ना हजारे के अनशन का समर्थन करता हूं। कम से कम संसद आगे आए और इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया दे। अन्ना हजारे जैसे लोग व्यवस्था के खिलाफ जनांदोलन का दबाव बनाएंगे, जिस तरह गांधी ने अंगेजों के खिलाफ किया था।'

आध्‍यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर ने कहा, ‘अन्‍ना का आंदोलन भारतीयों की आवाज है। मुझे उम्‍मीद है कि प्रधानमंत्री लोकपाल बिल के गठन के लिए तुरंत कदम उठाएंगे। मैं पिछले 25 साल से अन्‍ना हजारे को जानता हूं। आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन और मैं भ्रष्‍टाचार के खिलाफ उनकी लड़ाई और सामाजिक परिवर्तन की मुहिम में हमेशा से उनके साथ रहे हैं।’
आपकी राय
क्या अन्‍ना दूसरे गांधी साबित होंगे? अपनी ही सरकार के खिलाफ उनकी लड़ाई अंजाम तक पहुंच पाएगी? आखिर अन्‍ना ऐसी क्‍या मांग कर रहे हैं, जिसे मानने में सरकार को परेशानी हो रही है? जो सरकार कहती रही है कि वह भ्रष्‍टाचार के खिलाफ है, उसे भ्रष्‍टाचार पर निगरानी रखने के लिए जनता का एक प्रतिनिधि नियुक्‍त करने में क्‍यों परेशानी हो रही है? क्‍या यह सरकार का भ्रष्‍टाचार से निपटने को लेकर दोहरा रवैया नहीं उजागर करता है? ऐसे में सरकार कभी भ्रष्‍टाचार मिटा पाएगी? सरकार तैयार नहीं है तो जनता अपने दम पर भ्रष्‍टाचार से लड़ सकेगी? या फिर वह भ्रष्‍टाचार के साथ जीने की आदी और इसके लिए अभिशप्‍त हो चुकी है? ऐसे कई सवाल उठते हैं। इन सवालों के जवाब और बाकी सवाल आपस में पूछने-बताने के लिए आप बहस में शामिल हो सकते हैं।

Dhoni hai real hero

http://images.bhaskar.com/web2images/www.bhaskar.com/2011/04/08/images/anna_25611111_f.jpgजन लोकपाल बिल लाने के लिए आंदोलन कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे के समर्थन में पूरा देश उठ खड़ा हुआ है। सामाजिक कार्यकर्ताओं, उद्योगपतियों से लेकर स्‍कूली छात्र-छात्राएं, युवा, नौकरीपेशा, बुजुर्ग, महिलाएं और बॉलीवुड की नामचीन हस्तियां भी उनके समर्थन में आवाज उठाने लगी हैं।
उद्योगपतियों पवन मुंजाल और राहुल बजाज ने भी अन्‍ना हजारे का समर्थन किया है। बजाज ने कहा, 'मुझे अन्‍ना पर सरकार के किसी मंत्री से ज्‍यादा भरोसा है।' पवन मुंजाल ने कहा, 'अब समय आ गया है कि हम भ्रष्‍टाचार के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करें।‘
बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्‍चन ने ट्विटर पर जारी ताजा संदेश में कहा है, 'देश हित में जो भी कार्य हो, उसमें हमारा समर्थन हमेशा रहा है और हमेशा रहेगा।'  बॉलीवुड के मशहूर निर्माता निर्देशक महेश भट्ट ने ट्विटर पर जारी संदेश में कहा है, 'यदि आप अन्‍ना हजारे और उनके आंदोलन में यकीन रखते हैं तो याद कीजिए कि महात्‍मा गांधी ने क्‍या कहा था- अहिंसा की राह पर चलने वालों का कोई दुश्‍मन नहीं होता।'

अन्‍ना को समर्थन की आमिर की अपील पर भारतीय टीम के कप्‍तान महेंद्र सिंह धोनी ने ट्विटर पर भेजे अपने संदेश में कहा, ‘मैं आमिर खान से सहमत हूं। अन्‍ना हजारे को भारतीय क्रिकेट टीम से ज्‍यादा समर्थन मिलना चाहिए। कृपया हजारे को अपना समर्थन दें।’
आमिर खान ने कहा था कि भ्रष्टाचार के विरोध में मजबूत कानून लाए जाने को लेकर अन्ना हजारे को वर्ल्ड कप जीतने वाली टीम इंडिया से ज्यादा समर्थन की जरूरत है। गत 6 अप्रैल को अन्ना को लिखी गई चिट्ठी में आमिर ने उन्हें युवाओं के लिए आदर्श बताया है। आमिर ने प्रधानमंत्री को भी चिट्ठी लिखकर अन्ना की मांग को मानने की अपील की।

गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्विटर पर जारी संदेश में कहा, 'नवरात्रि के दौरान मां कामाख्‍या के दर्शन होने का सौभाग्‍य प्राइज़ हुआ है। अन्‍ना हजारे के बेहतर स्‍वास्‍थ्‍य की कामना की।'
बॉलीवुड अभिनेत्री बिपाशा बसु ने ट्विट किया है, 'अन्‍ना हजारे हमलोगों (भारत की जनता) के लिए खड़े हुए हैं इसलिए हमें उनका समर्थन करना चाहिए।'
बॉलीवुड अभिनेता अनुपम खेर का कहना है, 'आईपीएल में हिस्‍सा ले रहे सभी खिलाडियों और इन मैचों को देखने वाले क्रिकेटप्रेमियों से अपील करता हूं कि वो अन्‍ना हजारे के आंदोलन को समर्थन दें। जब कोई भ्रष्टाचार से लड़ा रहा हो तो मैं उनके तरीकों को जज नहीं करता। मैं उनके उद्देश्य और कार्यों की सराहना करता हूं। मैं अन्ना हज़ारे के साथ हूं। क्या आप हैं?'
बॉलीवुड अभिनेता शेखर कपूर का कहना है, 'सचिन, धोनी या आमिर नहीं, बल्कि आम आदमी को खड़े होना चाहिए और कहना चाहिए, नहीं! मैं अब और नहीं सहूंगा। और तब क्रांति हो पाएगी। मैं लोकपाल बिल पर राष्ट्रीय बहस कराए जाने के लिए अन्ना हजारे के अनशन का समर्थन करता हूं। कम से कम संसद आगे आए और इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया दे। अन्ना हजारे जैसे लोग व्यवस्था के खिलाफ जनांदोलन का दबाव बनाएंगे, जिस तरह गांधी ने अंगेजों के खिलाफ किया था।'

आध्‍यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर ने कहा, ‘अन्‍ना का आंदोलन भारतीयों की आवाज है। मुझे उम्‍मीद है कि प्रधानमंत्री लोकपाल बिल के गठन के लिए तुरंत कदम उठाएंगे। मैं पिछले 25 साल से अन्‍ना हजारे को जानता हूं। आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन और मैं भ्रष्‍टाचार के खिलाफ उनकी लड़ाई और सामाजिक परिवर्तन की मुहिम में हमेशा से उनके साथ रहे हैं।’
आपकी राय
क्या अन्‍ना दूसरे गांधी साबित होंगे? अपनी ही सरकार के खिलाफ उनकी लड़ाई अंजाम तक पहुंच पाएगी? आखिर अन्‍ना ऐसी क्‍या मांग कर रहे हैं, जिसे मानने में सरकार को परेशानी हो रही है? जो सरकार कहती रही है कि वह भ्रष्‍टाचार के खिलाफ है, उसे भ्रष्‍टाचार पर निगरानी रखने के लिए जनता का एक प्रतिनिधि नियुक्‍त करने में क्‍यों परेशानी हो रही है? क्‍या यह सरकार का भ्रष्‍टाचार से निपटने को लेकर दोहरा रवैया नहीं उजागर करता है? ऐसे में सरकार कभी भ्रष्‍टाचार मिटा पाएगी? सरकार तैयार नहीं है तो जनता अपने दम पर भ्रष्‍टाचार से लड़ सकेगी? या फिर वह भ्रष्‍टाचार के साथ जीने की आदी और इसके लिए अभिशप्‍त हो चुकी है? ऐसे कई सवाल उठते हैं। इन सवालों के जवाब और बाकी सवाल आपस में पूछने-बताने के लिए आप बहस में शामिल हो सकते हैं।

ANNA or IPL

ट्विटर के ट्रैंडिंग टॉपिक बताते हैं कि इंटरनेट पर क्या चर्चा हो रही है और लोग कैसे विचार शेयर कर रहे हैं। शुक्रवार दोपहर ट्विटर के भारत में सबसे सर्वाधिक चर्चित विषय थे- लोकपाल, अन्ना हजारे, करप्शन, मेरा नेता चोर है, आईपीएल, चेतन भगत, सीएसके और केकेआर।इनमें से सात विषय भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े हुएं आंदोलन से संबंधित थे जिनमें चेतन भगत और उनके द्वारा शुरु किया गया मेरा नेता चोर है अभियान भी शामिल है। इसके साथ ही जो तीन अन्य विषय थे वो हैं आईपीएल, सीएसके यानि चेन्नई सुपरकिंग्स और केकेआर यानि कोलकाता नाइट राइडर्स। यदि ट्विटर पर चर्चित इन विषयों को देश का माहौल समझा जाए तो इस समय देशभर में दो ही मुद्दों पर बात हो रही है एक तो भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग और दूसरा आईपीएल। दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक बुजुर्ग भ्रष्टाचार के खिलाफ बैठा और पूरा देश खड़ा हो गया। क्रिकेट विश्वकप जीतने के बाद देश जश्न मनाने सड़कों पर उतरा था। 2 अप्रैल की रात देश के कौने-कौने से यही आवाज आ रही थी- इंडिया-इंडिया। पिछले एक हफ्ते में देश में माहौल थोड़ा बदला है। अब आवाजें आ रही हैं सेव इंडिय-सेव इंडिया। जन लोकपाल बिल लाने के लए uहजारे की आवाज को मजबूत करने में इंटरनेट एक सशक्त माध्यम के रूप में उभरा है। जब से अन्ना अनशन पर बैठे हैं तब से इंटरनेट जगत में सिर्फ और सिर्फ अन्ना हजारे की ही चर्चा हो रही. लेकिन मजे की बात यह है कि आईपीएल विषय में जो ट्वीट्स हो रही हैं उनमें से भी ज्यादार लोगों से आईपीएल की खुमारी में भ्रष्टाचार की लड़ाई को न भूलने की अपील कर रही हैं।
आईपीएल विषय में शेयर की गई कुछ ट्वीट्स इस प्रकार हैं-
1. आईपीएल बीसीसीआई के अधीन है और बीसीसीआई आईसीसीके अधीन है और आईसीसी शरद पवार के अधीन है और अन्ना हजारे शरद पवार के खिलाफ ही तो जंग लड़ रहे हैं इसलिए आईपीएल से सहयोग की उम्मीद नहीं की जा सकती।
2. यदि आप स्टेडियम में आईपीएल का मैच देखने जा रहे हैं तो भ्रष्टाचार के खिलाफ पोस्टर भी ले जाएं।
3. मुझे डर ही की आईपीएल की आंधी में अन्ना का जलाया चराग न बुझ जाए। यदि ऐसा हुआ तो बहुत बुरा होगा।
4. यह देखकर अच्छा लग रहा है कि लोकपाल आईपीएल से ज्यादा ध्यान आकर्षित कर रहा है
5. ललित मोदी मोदी का लोगों से यह अपील करना की आईपीएल देखने जाते वक्त भ्रष्टाचार के खिलाफ पोस्टर लेकर जाओ अच्छा संकेत है।
6. आईपीएल शुरु हो रहा है अब लोग टीवी के आगे बैठकर अनशन करेंगे।
7. मैं आईपीएल (इंडियन पीपुल्स लीग) के साथ हूं जो अन्ना हजारे का समर्थन कर रही है।
8. आप देश को भ्रष्टाचार से बचाएंगे या आईपीएल देखते हुए पॉपकॉर्न खाएंगे।

गुरुवार, 3 मार्च 2011

जहां ना पहुंचा रवि

इस शेर को एकाधिक परिपेक्ष्य में सफ़लता से प्रयोग में लाते देखा है लोगों को.
१. दुनिया बनाने वाले के छुपे राज़ की पर्तों पर [वैज्ञानिक/फ़लसफ़ाई नज़र की दाद में]
२. शम्मा के जलने और परवाने की अनुपलब्धता के परिपेक्ष्य में [हुस्न की समझ और उसके एप्रिसिएशन करने वाले की शान में]
३. जहां ना पहुंचा रवि वहां ठस्स गए कवि वाले केस में... आदी

व्यक्तिगत रूप से मुझे पहले केस पर ही यह माकूल फ़िट लगता है और यह चर्चा भी उसी नतीजे पर है जान कर संतोष हुआ. प्रमोद जी ने यहाँ आगे-पीछे के शेर देकर मामला बड़ा सुलभ कर दिया। इन पर थोड़ी देर सोचने के बाद और कुछ देर तक मित्र फ़रीद ख़ान से विमर्श करने के बाद मैं इस शेर के ऐसे अर्थ के क़रीब पहुँचा हूँ जिससे एक नई रौशनी मिलती है। सबसे पहले तो मेरे विचार से यहाँ नरगिस फूल के अर्थ में है ही नहीं। ईरान कल्चर हाउस दारा प्रकाशित शब्दकोष के अनुसार नरगिस का एक अर्थ प्रियतमा की आँख भी होता है। उसी परम्परा से 'ऐ नरगिसे मस्ताना' जैसे जुमले बनते हैं। नज़्म में लगातार आँख और दृष्टि की बात हो रही है। जहाँबीनी (दुनिया को देखना) चश्मे दिल फिर नज़र.. उस्के आगे फिर दीदावर (देखने वाला)।
 
तो अर्थ कुछ यूँ बनेगा: संसार पर शासन करने से कठिन है संसार को समझना।  जिगर में (कठिनाई झेलने का) ताब रखकर करके ही हृदय में एक दृष्टि पैदा होती है। नहीं तो आँख होते हुए भी बेनूर (यानी अंधी) बनी रहती है। बड़ी मुश्किल से दुनिया को समझने वाला पैदा होता है। यह बात इक़बाल के मर्दे मोमिन के विचार से मेल खाती है। 

गुरुवार, 6 जनवरी 2011

राजद्रोह या धर्मयुद्ध ----sunday mag..

एक तरफ वाम आतंकवाद के आरोप में फंसे डॉ. बिनायक सेन को कोर्ट ने राजद्रोह की सजा सुनाई तो दूसरी ओर मालेगांव और अजमेरशरीफ विस्फोट के सिलसिले में हिंदू संगठनों से जुड़े युवकों पर जांच एजेंसियों का शिकंजा कस रहा है लेकिन माओवाद और नक्सली समर्थकों को जहां अपना संघर्ष जनयुद्ध लगता है वहीं आतंकवाद के चलते जांच एजेंसियों के घेरे में आए हिंदू युवक इस लड़ाई को धर्मयुद्ध के तौर पर पेश कर रहे हैं। इससे राजद्रोह और धर्मयुद्ध को लेकर देश में एक नई बहस खड़ी हो गई है

                                           भारतीय राज्य व्यवस्था को हथियारबंद संघर्ष से चुनौती देना गैर-कानूनी है। यह बात पेशे से चिकित्सक और पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) के प्रमुख पदाधिकारी डॉ. बिनायक सेन भी अच्छी तरह समझते हैं लेकिन इसके बावजूद सेन जेल में बंद नक्सली नेताओं और प्रतिबंधित संगठन माओवादियों के बीच संदेशवाहक का काम करते रहे। बिनायक सेन पर यह भी आरोप है कि वह उन माओवादियों और नक्सलियों का इलाज किया करते थे जो हथियारों के बल पर लंबे समय से देश की सत्ता और संविधान को चुनौती देने का काम कर रहे हैं। ऐसा हथियारबंद संघर्ष भारतीय दंड संहिता में 'राजद्रोह' के बराबर का अपराध माना जाता है।
छत्तीसगढ़ राज्य के रायपुर के सत्र न्यायालय ने जब बिनायक सेन को राजद्रोह के तहत सजा सुनाई तो रायपुर से लेकर दिल्लीClick here to see more news from this city और लंदन-अमेरिका तक इस फैसले पर सवाल उठाए जाने लगे। दूसरी तरफ साध्वी प्रज्ञा, असीमानंद दयानंद पांडे जैसे भगवाधारी और भारतीय सेना में देश की सेवा के लिए शामिल होने वाले कर्नल पुरोहित सरीखे जवान एक ऐसे 'धर्मयुद्ध' में लगे थे जिसकी इजाजत देश का संविधान उन्हें नहीं देता। उनके द्वारा मालेगांव और अजमेर सहित कई स्थानों पर किए गए बम धमाकों ने एक धर्म विशेष के लोगों को आतंकित करने का काम किया। यह दोनों ही कारगुजारियां राजद्रोह और धर्मयुद्ध को लेकर एक नई बहस खड़ी कर रही हैं।
माओवादियों के चितंन और साहित्य से ऐसा लगता है कि उन्हें न तो देश के संविधान में विश्वास है और न ही न्यायपालिका में। चर्चित नक्सली मामले में रायपुर के जिला न्यायालय ने नारायण सान्याल, डॉ. बिनायक सेन और पीयूष उर्फ पीजूष गुहा को उम्रकैद की सजा सुनाई। तीनों को न्यायालय ने देशद्रोह का षड्यंत्र रचने, विधि विरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम 1967 (यूएपीए) एवं छत्तीसगढ़ विशेष जनसुरक्षा अधिनियम के तहत दोषी ठहराया। असल में नक्सलियों के मददगार के मामले में न्यायालय द्वारा दंडित पीयूष उर्फ पीजूष गुहा की गिरफ्तारी के बाद से ही कई राज खुलने लगे थे। तीन साल पहले हुई पूछताछ में पीयूसीएल के नेता डॉ. बिनायक सेन व नक्सलियों के नेता नारायण सान्याल के संबंधों का खुलासा हुआ था। 
केस डायरी के मुताबिक 6 मई, 2007 को चेकिंग के दौरान गंज थाने के तत्कालीन थाना प्रभारी बीएस जागृत ने नक्सलियों के मैसेंजर पीयूष गुहा को संदिग्ध अवस्था में पकड़ा। तलाशी में उसके बैग से नक्सली साहित्य, नारायण सान्याल के लिखे तीन पत्र आदि मिले। पूछताछ में पीयूष ने बताया कि तीनों पत्र बिनायक सेन ने दिए थे। जांच में पाया गया कि ये पत्र नक्सली नेता नारायण सान्याल द्वारा जेल में मुलाकात के दौरान सेन को दिए गए थे। सेन ने पीयूष को उक्त पत्रों में अंकित गोपनीय कोड नंबरों पर प्रेषित करने के लिए दिए थे। सेन अक्सर नारायण सान्याल से जेल में मिलने आते थे। वह अपना परिचय नारायण के भाई तथा रिश्तेदार के रूप में देते थे। डॉ. सेन को बिलासपुर के तारबहार इलाके से गिरफ्तार किया गया।
सेन के कटोरा तालाब स्थित आवास से जब्त दस्तावेज, कंप्यूटर, सीपीयू को हैदराबादClick here to see more news from this city फोरेसिंक लैब में जांच के लिए भेजा गया। उनसे चौंकाने वाली बात सामने आई। नारायण सान्याल के खिलाफ छत्तीसगढ़ के अलावा आंध्र प्रदेश, बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र में भी अपराध दर्ज हैं। पूरे प्रकरण में 1180 पेज का आरोप पत्र पुलिस ने न्यायालय में पेश किया। हालांकि सेन की पत्नी इलिना का कहना है कि राज्य पुलिस द्वारा तैयार डायरी फर्जी है। मनगढ़ंत तथ्य तैयार कर उनके पति के खिलाफ पेश किए गए हैं।
पुलिस द्वारा पेश किए सबूत ठोस नहीं है। वे जनहित के मुद्दों पर आवाज उठाते थे। मगर, इस प्रकरण के बाद माओवादियों के चाल-चलन को लेकर चौतरफा बहस हो रही है। माओवादी नक्सली समर्थक उन्हें आतंकवादी या लुटेरा नहीं बल्कि आदिवासियों का हमदर्द और जंगल के रक्षक के रूप में पेश करते हैं। केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम की मानें तो माओवादी न्यायाधिकारी या दंडाधिकारी नहीं हैं। उन्हें हथियार लेकर चलने का भी कोई हक नहीं है। सीपीआई (माओवादी) एक प्रतिबंधित संगठन है जिसकी गतिविधियां गैर कानूनी हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी अपने भाषण में यह कह चुके हैं कि वामपंथी उग्रवाद देश की आतंरिक सुरक्षा के लिए अकेला सबसे बड़ा खतरा है। 
असल में माओवादी-नक्सलियों की क्रांति से आतंकवाद तक की कहानी भयानक हत्याकांडों से भरी हुई है। आतंक के इस चेहरे को इन आंकड़ों से भी समझा जा सकता है कि बीते छह वर्षों में जितने लोग माओवादी-नक्सली हिंसा में मारे गए उनकी संख्या इस दौरान जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर के आतंकवाद प्रभावित क्षेत्रों में मारे गए लोगों से कहीं ज्यादा थी। इस अवधि में 2802 निर्दोष लोग नक्सल हिंसा में मारे गए। एक हजार से ज्यादा सुरक्षाकर्मी शहीद हुए और मुठभेड़ के दौरान 977 माओवादी आतंकवादी मारे गए।

2007
से 2009 के मध्य नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में 5395 घटनाएं घटीं। इनमें 557 नक्सली मारे गए लेकिन डेढ़ हजार से अधिक नागरिकों और 784 सुरक्षाकर्मियों को भी अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। माओवादी आतंकवाद अपनी जड़ें कितनी गहरी जमा चुका है इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि देश के 20 राज्यों के 223 जिले उनका शिकार बन चुके हैं। आंध्र प्रदेश में माओवादी कार्रवाइयां थमने के बाद छत्तीसगढ़ माओवाद से सबसे बुरी तरह प्रभावित है।
बस्तर का लगभग 70 फीसदी इलाका माओवादी नियंत्रण में है। नक्सली इस क्षेत्र में एक समानांतर सरकार चला रहे हैं और राष्ट्र के खिलाफ अपनी लड़ाई चालू रखने की कसम खाते हैं। इस लड़ाई को वे 'लोगों का संघर्ष' कहते हैं। बस्तर के घने जंगल माओवादियों की शरणगाह माने जाते हैं। यह 'रेड कॉरिडोर' का एक हिस्सा है जो नेपाल सीमा से आंध्र प्रदेश तक जाता है (माओवादी इसे दंडकारण्य जोन कहते हैं)। दक्षिणी बस्तर में माओवादियों ने चिंतानेर इलाके को अपनी राजधानी घोषित किया है। छत्तीसगढ़ में सीपीआई (माओवादी) के लगभग 10,000 कैडर काम कर रहे हैं जिनमें स्थानीय गुरिल्ला स्क्वायड और 'जन मिलिशिया' इकाइयां शामिल हैं। लगभग 5,000 नक्सली सिर्फ बस्तर में बताए जाते हैं। उनके पास आधुनिक हथियार जैसे रॉकेट लांचर, एके-47 राइफलें, ग्रेनेड, पिस्तौल, लैंडमाइंस, इनसास राइफलें हैं जिन्हें उन्होंने सुरक्षाकर्मियों से लूटा है।
अगर कोई सात नक्सल प्रभावित राज्यों - छत्तीसगढ़, झारखंड, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, बिहार, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में 'करों' से अर्जित आय का हिसाब जोड़े तो यह राशि 10,000 करोड़ रुपए वार्षिक से अधिक हो सकती है। पुलिस ने 'लेवी चार्ट' बरामद किया है जिसमें ठेकेदारों, पेट्रोल पंप और भूस्वामियों, व्यवसायियों, ट्रांसपोर्टरों और इंडस्ट्रियल हाउसों से एकत्रित की जाने वाली राशि दी गई थी। वे प्राप्त 'चंदे' के लिए रसीद तक देते हैं। यह शुल्क सड़कों का निर्माण करने वाले ठेकेदारों से परियोजना लागत के 10 फीसदी से लेकर छोटे पुल बनाने वालों और अन्य से 5 फीसदी तक है। बहरहाल, निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयां अपने रिकॉर्डों में माओवादियों को भुगतान किए जाने वाले 'कर' को नहीं दर्शाते। आमतौर पर वे किसी खास ठेकेदार को बड़े टेंडर आवंटित करते हैं जिनके माध्यम से शुल्क वामपंथी उग्रवादियों को जाता है।
पुलिस के खिलाफ जारी हिंसा में नक्सली क्रूर हैं और वे गरीबों तक को नहीं छोड़ते इसका उदाहण पश्चिम बंगाल के बांकुरा इलाके के पुलिस जवान संजय घोष के अपहरण और उसकी निर्मम हत्या से मिलता है। नक्सलियों ने 24 जनवरी, 2010 को उसका अपहरण करने के बाद बेहद यातनाएं दीं। उसका सिर काटने से पहले उसके हाथ काट दिए गए थे।
दरअसल, नक्सली अपने वर्ग शत्रुओं की सूची में पुलिस को सबसे ऊपर रखते हैं। उन्हें लगता है कि क्रांति-विरोधी सरकार पुलिस बल के जरिए ही उनका दमन करती है। लिहाजा सुरक्षा बलों पर हमले किए जाते हैं। पुलिस बलों पर हमले से गांववासियों और पुलिस के मुखबिरों में नक्सलियों की दहशत घर कर जाती है। इस दहशत का लाभ नक्सली क्षेत्र में अपना दबदबा बनाने में उपयोग करते हैं।
झारखंड में पुलिस अधिकारी फ्रांसिस इंदवार का अपहरण कर गला काटकर हत्या कर दी गई तो पश्चिम बंगाल में पुलिस सब-इंस्पेक्टर अतींद्रनाथ दत्त का अहपहण कर उसकी रिहाई के बदले में अपने समर्र्थकों को जेल से रिहा करवा लिया गया। देश के खिलाफ माओवादियों की सोच और राजद्रोह जैसा उनका आचरण इस बात से भी समझा सकता है कि पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के प्रमुख कोटेश्वर राव उर्फ किशनजी ने लालगढ़ के दोहोमिना गांव में संवाददाता सम्मेलन में दत्त की रिहाई का एलान किया। सरकार के साथ टकराव में माओवादियों ने दत्त को युद्ध कैदी घोषित किया। दत्त के सीने पर लगे एक पोस्टर पर लिखा गया था, 'युद्ध कैदी की रिहाई के लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस।' बंगाल में सीपीआई (माओवादी) की ओर से पुलिसवालों को लिखा गया एक पत्र सामने आया जिसमें कहा गया था कि पुलिस सरकार के खिलाफ विद्रोह कर दे। हमारा उद्देश्य सरकारी तंत्र को ध्वस्त कर अपना तंत्र स्थापित करना है।
छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन कहते हैं कि माओवादी नक्सली आतंकवादियों से भी कहीं ज्यादा खतरनाक हैं। अगर यह आतंकवाद तक ही सीमित रहता तो शायद कुछ आसानी रहती। हम आतंकवाद का नहीं बल्कि युद्ध का सामना कर रहे हैं। नक्सली लोकतंत्र में विश्वास नहीं करते और हिंसा के जरिए पूरे देश पर शासन करना चाहते हैं।' इस बात की ओर मिलिट्री इंटेलीजेंस की एक अत्यंत गोपनीय रिपोर्ट भी इशारा करती है। रिपोर्ट के मुताबिक माओवादी सन्‌ 2050 तक दिल्लीClick here to see more news from this city पर काबिज होना चाहते हैं। इसके लिए वह सोच-समझकर अपनी रणनीति को अंजाम दे रहे हैं।
नक्सलियों का लाल गलियारा नेपाल से लगने वाली देश की सीमा से शुरू होकर आंध्र प्रदेश तक जाता है। लंबे अरसे तक नक्सलवाद को मानवीय या आदिवासी समस्या के रूप में देखती आई केंद्र सरकार ने वर्ष 2009 में सीपीआई (माओवाद) को प्रतिबंधित संगठन माना और प्रतिबंधित किया। वरिष्ठ पत्रकार और 'नक्सली आतंकवाद' नामक पुस्तक लिखने वाले विवेक सक्सेना कहते हैं कि प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता और नक्सलवाद के विकास में सीधा संबंध देखने को मिलता है। देश में किए गए तमाम अध्ययनों से यह साफ हुआ है कि जिस राज्य में खनिज और दूसरे प्राकृतिक संसाधनों की जितनी ज्यादा मौजूदगी है वहां नक्सलवाद भी उतना ही ज्यादा पनपा है।'
एक मोटे अनुमान के मुताबिक वे हर साल लगभग 1,200 करोड़ रुपए एकत्रित करते हैं। गृह मंत्री चिदंबरम माओवादियों को चालाक पूंजीवादी करार देते हुए कहते रहे हैं कि वे अपना व्यवसाय अवैध ढंग से चला रहे हैं। वे किराया वसूलते हैं और टैक्स नहीं चुकाते तथा इस धन का इस्तेमाल शासन के खिलाफ करते है। बकौल चिदंबरम, 'नक्सली लुटरों की तरह बैंकों को लूट कर और खनन उद्योगों से पैेसे ऐंठ कर धन इकट्ठा करते हैं। इस धन से हथियार खरीदते हैं और सुरक्षाकर्मियों से भी हथियार लूटते हैं।
भारत, पाक, नेपाल या बांग्लादेश की सीमा पर स्थित बाजारों से आसानी से हथियार खरीदे जा सकते हैं। नक्सली इन बाजारों से हथियार खरीदते हैं।' नतीजतन आतंकवाद से भी विकराल और हिंसक चेहरा माओवादी नक्सलियों का आतंक एक प्रकार से राजद्रोह का रूप धारण करता जा रहा है। इस बात पर डॉ. सेन और उनके साथियों को राजद्रोह की सजा सुनाकर रायपुर के सत्र न्यायालय ने अपनी मुहर लगा दी है। जाहिर है, कानून के इस फैसले के बाद माओवादी-नक्सली और उनके समर्थक न्याय के लिए अब नया अभियान चलाएंगे।

शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010

फ्रिज में होता है वायरस व बैक्टीरिया

आमतौर पर फ्रिज में रखे सामान को सुरक्षित मान लेते हैं लोग। लेकिन ग्लोबल हाईजीन काउंसिल के ताजा अध्ययनों से यह बात सामने आई है कि फ्रिज में रखे सामान 70 फीसदी गंदे होते हैं। जबकि 95 फीसदी बाथरूम में बैक्टीरिया और वायरस का साम्राज्य रहता है। इन बैक्टीरिया व वायरस के कारण आम भारतीय पेट की खराबी, सांस की तकलीफ, चर्म रोग, फुड प्वाइजनिंग और एलर्जी का शिकार हो रहे हैं।
काउंसिल के भारत प्रतिनिधि डॉ.नरेंद्र सैनी ने संवाददाताओं से कहा कि हाथ की सफाई ठीक से न होने के कारण बैक्टीरिया व वायरस तेजी से फैलता है। जिन सामान को ऐसे हाथों से छुआ जाता है उसमें बैक्टीरिया व वायरस चला जाता है। कंप्यूटर की 22 फीसदी की बोर्ड में वायरस का साम्राज्य रहता है। जबकि टेलिफोन पर 45 फीसदी वायरस पाया गया है। किचन में काम करने वाली महिलाएं एक ही तौलिए का उपयोग कई कामों में करती है और प्रतिदिन साफ नहीं करती है। जिसके कारण 75 फीसदी वायरस जमा रहता है। हाथ में जमा वायरस छह से 48 घंटे तक जिंदा रहता है।

बुधवार, 20 अक्टूबर 2010

दोपहर में महिलाओं से न लें पंगा नहीं तो...

पुरुषों के लिए एक बहुत ही जरूरी सलाह। वे दोपहर के वक्त महिलाओं के साथ किसी भी कीमत पर उलझने से बचें। नहीं तो इस समय महिलाओं के साथ बहसबाजी में उन्हें मुंह की खानी पड़ सकती है।

जी हां, लोगों के मिजाज पर किए गए एक सर्वे के नतीजे पर यकीन करें तो पुरुषों को इस सलाह पर जरूर अमल करना चाहिए। वरना, उन्हें महिलाओं से मात मिल सकती है। अध्ययन के नतीजों में यह भी कहा गया है कि यदि महिलाएं पुरुषों से कुछ कहना चाहती हैं तो उन्हें शाम के छह बजे तक इंतजार करना चाहिए, क्योंकि यही वह समय है जब पुरु ष अपने करीबी लोगों की मांगों को पूरी करते हैं।
ब्रिटेन में हुए इस अध्ययन में 1,000 पुरु षों और महिलाओं को शामिल किया गया था। अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि जब किसी महिला को तनख्वाह में इजाफे या प्रोन्नति की बात अपने बॉस से कहनी हो तो वह यह काम सुबह में न कर दोपहर एक बजे करे। इस वक्त उनकी मांगें पूरी होने की ज्यादा संभावना रहती है।
नतीजों के मुताबिक, दोपहर एक बजे के बाद का समय ऐसा होता है जब प्रबंधक अपने कर्मचारियों की मांग के प्रति बहुत उदार होता है। रिपोर्ट के मुताबिक, ‘महिलाएं यह जानकर काफी खुश होंगी कि मूड में होने वाले उतार-चढ़ाव से सिर्फ वहीं पीड़ित नहीं हैं, बल्कि ऐसा पुरुषों में भी देखा जाता है।’

पत्नी से प्रताड़ित डॉक्टर फांसी पर झूला

कानपुर। उन्नाव के सरकारी अस्पताल में तैनात एक डॉक्टर ने अपनी पत्नी से प्रताड़ित होकर फांसी लगा आत्म हत्या कर ली। बहन ने जब उसके कमरे में देखा तो वह पंखे से झूल रहा था। चीख सुनकर परिवार के सभी लोग वहां पुहंच गए।
डॉक्टर ने अपने सुसाइड नोट में लिखा है कि वह अपनी पत्नी के व्यवहार से मानसिक रुप से परेशान होकर ऐसा कदम उठा रहा है। सूचना पाकर पुलिस मौके पर पहुंची और परिजनों से पूंछतांछ करने के बाद शव पोस्टमार्टम को भेज दिया है। घटना नजीराबाद थाना क्षेत्र की है। जानकारी के मुताबिक हर्ष नगर के मकान नंबर 42 108 में रहने वाले शंकर सिंह का पुत्र सिद्धार्थ (36) सरकारी डॉक्टर था और उन्नाव जिले के सिंकदरापुर सौरासी गांव के प्राथमिक स्वास्थ केंद्र में मुख्य चिकित्सक के रुप में कार्यरत था।
उसकी पत्नी रेनू नगर के एसएनसेन इंटर कालेज में टीचर है और काफी समय से अपने मायके किदवई नगर में रह रही है। पिता शंकर सिंह का आरोप है कि उनकी बहू रेनू के किसी व्यक्ति से अवैध संबंध है। जिसका बेटा सिद्धार्थ हमेशा विरोध करता था। इसी विरोध के कारण विगत वर्ष अक्टूबर माह में रेनू ने सिद्धार्थ का रोड एक्सीडेंट भी करा दिया था। जिससे सिद्धार्थ के दोनों पैरों में फैक्चर होने के कारण सरिया डाली गयी थी।शंकर सिंह का यह भी आरोप है कि रेनू व साथ पढ़ाने वाली उसकी सहेली किरन दोनों उनके बेटे को फोन पर अक्सर अपाहिज कह कर धमकया करती थीं। जिस कारण सिद्धार्थ मानसिक रुप से बहुत परेशान रहता था। आज सुबह जब सिद्धार्थ काफी देर तक अपने कमरे से बाहर नहीं निकला तो बेटी ने दरवाजा खोलकर अंदर देखा और फांसी से झूलता भाई का शव देखकर वह चीख पड़ी। सिद्धार्थ अपने तीन भाइयों में सबसे छोटा था। उसकी चार बहने भी है। सिद्धार्थ की मौत के बाद पूरे परिवार में कोहराम मच गया। वहीं पति की मौत की खबर मिलने के बाद भी रेनू अपने मायके से नहीं आयी।

मंगलवार, 19 अक्टूबर 2010

क्या है हाइवे हिंदुस्तान?

बीबीसी हिंदी की टीम 21 मार्च से भारत के विभिन्न हिस्सों में गोल्डन क्वाड्रिलेटरल यानी स्वर्णिम चतुर्भुज पर यात्रा कर रही है. 21 दिनों की इस यात्रा का उद्देश्य यह जानने की कोशिश करना है कि इन तेज़ रफ़्तार सड़कों से क्या कुछ बदल रहा है.

स्वर्णिम चतुर्भुज के प्रभावों का आकलन करने के लिए बीबीसी हिंदी के संवाददाताओं की टीम देश के दो हिस्सों में यात्रा करेगी. एक हिस्सा उत्तरी भारत से पूर्वी भारत का होगा और दूसरा दक्षिण भारत से पश्चिमी भारत का.

बीबीसी की टीम प्रतिदिन औसतन 300 किलोमीटर की यात्रा करेगी.
सवाल

भारत के भूतल परिवहन मंत्री कमलनाथ ने जून 2010 से प्रतिदिन 20 किलोमीटर सड़क निर्माण का लक्ष्य रखा है. यानी एक साल में सात हज़ार किलोमीटर सड़कें.

इस योजना का मुख्य लक्ष्य राज्य की राजधानियों को गोल्डन क्वाड्रिलेट्रल यानी स्वर्णिम चतुर्भुज से जोड़ना है. स्वर्णिम चतुर्भुज देश को चार महानगरों, दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई और मुंबई को तेज़ रफ़्तार यातायात के लिए चलने वाली सड़कों से जोड़ने वाली परियोजना है जो अब लगभग पूरी हो चुकी है.

भारत में सड़कों को जोड़ने की यह परियोजना बीसवीं सदी के 20 और 50 के दशक में अमरीका में सड़क निर्माण परियोजनाओं की याद दिलाती है. अमरीका में सड़कों ने न केवल विकास को बढ़ावा दिया बल्कि इससे व्यापार और कारोबार को बहुत बढ़ावा मिला.

यह जानने की सहज इच्छा होती है कि भारत में सड़कों के निर्माण से क्या कुछ बदल रहा है? सड़कों के किनारे की ज़मीनें महंगी हो रही हैं, नए निर्माण हो रहे हैं, नए शहर विकसित हो रहे हैं, ढाबों का चलन बढ़ा है, लेकिन इसने किसानों को खेती से दूर भी किया है, स़डकों के रास्ते एचआईवी-एड्स जैसी घातक बीमारी घरों तक पहुँच रही हैं.

कई और सवाल भी हैं. मसलन क्या इसकी वजह से शहरीकरण बढ़ रहा है? क्या इससे रोज़गार के अवसर बढ़े हैं? और क्या यह व्यापार-कोरोबार की बढ़ोत्तरी में कोई भूमिका निभा रहा है?
यात्रा
राजपथ, दिल्ली

केंद्र सरकार और राज्य सरकारों ने पिछले दस सालों में सड़कों पर बहुत काम किया है

इन सब सवालों के जवाब तलाश करने के लिए बीबीसी संवाददाताओं की एक टीम स्वर्णिम चतुर्भुज पर तीन हफ़्ते यात्रा कर रही है.

वे यह जानने की कोशिश करेंगे कि इसने लोगों के जीवन पर कैसा असर डाला है और इससे समाज किस तरह बदल रहा है? क्या इससे सचमुच एक नए भारत का निर्माण हो रहा है, जैसा कि इस परियोजना को लेकर सरकारों का दावा रहा है?

संवाददाताओं की यह टीम अपने अनुभवों को विशेष रेडियो कार्यक्रमों के ज़रिए श्रोताओं से साझा करेगी, तस्वीरों और वीडियो के ज़रिए बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के पाठकों से रूबरू होगी. यह टीम अपनी यात्रा के दौरान बीबीसी के श्रोताओं और पाठकों से उनके अनुभव भी साझा करेगी.
यात्रा का मार्ग

पहले चरण की यात्रा 21 मार्च को वाराणसी से शुरु होगी और 30 मार्च को कोलकाता में ख़त्म होगी. उत्तर प्रदेश से शुरु होकर यह यात्रा बिहार और झारखंड से होकर पश्चिम बंगाल में ख़त्म होगी.

चकाचौंध के पीछे का अंधेरा

अध्यादेश लागू, आत्महत्याएँ जारी

ग्रामीण गरीबों को छोटे ऋण देने वाली संस्थाओं या माइक्रो फ़ाइनैंस कंपनियों की अनियमितताओं से निपटने के लिए आंध्र प्रदेश सरकार का अध्यादेश लागू हो गया है.
इसके अंतर्गत ऋण की वसूली के लिए किसी को डराना-धमकाना एक अपराध बन गया है. इसके लिए तीन वर्ष क़ैद की सज़ा हो सकती है और एक लाख रूपए जुर्माना हो सकता है.

इस अध्यादेश पर राज्यपाल ईएसएल नरसिम्हन ने शुक्रवार को हस्ताक्षर किए और राज्य के ग्रामीण विकास मंत्री वी वसंता कुमार ने कहा कि इस पर तुरंत अमल शुरू हो जाएगा.
इस बीच राज्य में माइक्रो फ़ाइनैंस कंपनियों से ऋण लेकर परेशानियाँ झेलने वाले लोगों की आत्महत्याओं का सिलसिला थम नहीं रहा है.
गुरुवार और शुक्रवार दो और व्यक्तियों ने डराने-धमकाने से तंग आकर अपनी जान ले ली.

आत्महत्याएँ जारी

एक घटना शुक्रवार को वारंगल ज़िले के वेंकटादरी गाँव में हुई जहाँ रमेश नाम के एक खेत मज़दूर ने आत्महत्या कर ली. उस के परिवार वालों का आरोप है कि उसे एक माइक्रो फ़ाइनैंस कंपनी के लोग ऋण की वापसी के लिए परेशान कर रहे थे.
ऐसी ही एक घटना गुरुवार कड़प्पा ज़िले में हुई जहाँ वेल्लम्वारिपल्ली गाँव के एक किसान रमन्ना रेड्डी ने कीटनाशक दवा पीकर आत्महत्या कर ली. उसने दो अलग अलग कंपनियों से तीस हज़ार रुपये का ऋण लिया था लेकिन उसे वापस अदा नहीं कर पा रहा था.

अनंतपुर ज़िले में भी एक कंपनी के कर्मचारियों ने उन लोगों के घरों में तोड़फोड़ की जो ऋण वापस नहीं कर पा रहे थे.
ऐसी ही एक कार्रवाई के जवाब में खम्मम जिले में कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं ने एक माइक्रो फ़ाइनैंस कंपनी के कार्यालय पर धावा बोल दिया और वहां तोड़फोड़ की.

नए नियम


ग्रामीण विकास मंत्री वसंता कुमार ने कहा है कि इस अध्यादेश के पारित होने के साथ ही अब केवल उन्हीं माइक्रो फ़ाइनैंस कंपनियों को राज्य में काम करने की अनुमति होगी जो अपना पंजीकरण करवाएँगीं.
इस अध्यादेश के अलावा कर्ज़ के बोझ तले दबे लोगों, विशेषकर महिलाओं के स्व-सहायता समूहों की मदद के लिए सरकार एक नई योजना बना रही है
वी वसंता कुमार, ग्रामीण विकास मंत्री
इसके लिए उन्हें तीस दिन का समय दिया गया है.
अध्यादेश के अंतर्गत इन कंपनियों को अपने कार्यालय में एक बोर्ड पर यह साफ़ लिखना होगा की वे किस ब्याज़ दर पर ऋण दे रहे हैं और ऋण लेने वाले पर कितना बोझ पड़ने वाला है.

इन कंपनियों पर आरोप है कि वो ऋण लेने वाले ग्रामीण ग़रीबों और महिलाओं को स्पष्ट रूप से नहीं बताते कि कुल मिलाकर उन्हें कितना प्रतिशत ब्याज़ देना होगा.
आरोप है कि कई कंपनियाँ तो 30 से 50 प्रतिशत तक ब्याज़ लेती हैं.

सरकार ने अपनी ओर से इन संस्थानों के लिए ब्याज़ दरों की कोई सीमा तय नहीं की है. मंत्री वसंता कुमार का कहना था कि यह राज्य सरकार के दायरे से बाहर है.
वसंता कुमार ने बताया, "इस अध्यादेश के अलावा कर्ज़ के बोझ तले दबे लोगों, विशेषकर महिलाओं के स्व-सहायता समूहों की मदद के लिए सरकार एक नई योजना बना रही है."
इसके अंतर्गत सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से कहा जाएगा कि वो महिलाओं के समूहों को ऋण दें ताकि वो माइक्रो फ़ाइनैंस कंपनियों का ऋण वापस लौटा सकें.
इन बैंकों की ब्याज़ दर माइक्रो फ़ाइनैंस कंपनियों से कम होंगीं.
अगर बैंक यह सुझाव स्वीकार कर लेते हैं तो फिर उन्हें महिलाओं के समूहों को 9600 करोड़ रुपए के ऋण देने होंगे क्योंकि माइक्रो फ़ाइनैंस कंपनियों को इन ग्रामीणों से इतना ही ऋण वसूल करना है.
आंध्र प्रदेश में एक करोड़ से भी ज़्यादा महिलाएँ स्व-सहायता समूहों की सदस्य हैं.
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सांसद पी मधु का कहना है कि इन समूहों को बैंकों से कर्ज़ न मिलने की वजह से ही वे माइक्रो फ़ाइनैंस कंपनियों से कर्ज़ लेने को मज़बूर हुए हैं.
उनका कहना है कि इन समूहों को 12 से 15 हज़ार करोड़ रुपए मिलने चाहिए जबकि सरकार सिर्फ़ 11 सौ करोड़ रुपए उपलब्ध करवा रही है

खत लिख दे सावरियां के नाम

खत लिख दे सावरियां के नाम बाबू वो जान जायेंगे पहचान जायेंगे कोई तीन दशक पूर्व बंबईया फिल्म का यह गीत उन लोगों को बहुत भाता था जो दूसराेंं के लिये खत लिखने का काम करते थे और इसके बदले उन्हे चन्द पैसे मिल जाया करते थे1लेकिन अब न तो खत लिखने व पढने का काम मिलता है और न ही यह गाना बजता है1

पुराने दिनों की याद करते हुए एक खत लिखने वाले बुजुर्ग 70 वर्षीय रामाश्रय शर्मा ने बताया कि वे कक्षा चौथी में जब पढते थे तो पोस्टकार्ड पढने और फिर जवाबी पोस्टकार्ड लिखने के एवज में उन्हे एक आना मिला करता था 1 महीने में 10 से 12 आने की कमाई पोस्टकार्ड लिखने और पढने से हो जाया करती थी 1 बचपन में जेब खर्च के लिये यह रकम काफी थी1


आठवीं कक्षा तक शिक्षा प्राप्त श्री शर्मा ने बताया कि नौकरी न मिलने तक वे खत पढने और लिखने का काम करते रहे 1इससे जहां गांव में उनकी अच्छी खासी पूछपरख होती थी और कमाई भी हो जाया करती थी ् लेकिन जैसे जैसे शिक्षा का प्रसार प्रचार होता गया लोगों ने खुद ही लिखना पढना शुरू कर दिया1 वर्ष 1968 तक वे इस काम में लगे रहे और उनकी देखा देखी गांव के और भी पढे लिखे लडकों ने खत लिखने और पढने का काम शुरू कर दिया था 1यहां तक कि वे लोग आसपास के गांवों में भी जाकर लोेगों की चिट्ठियां पढकर सुनाने का काम कर दिया करते थे 1

श्री शर्मा ने बताया कि कुछ डाक बाबू अर्थात डाकिया भी खत पढने और लिखने का काम किया करते थे 1सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि खत पढने और लिखने वाला व्यक्ति खत की बात सार्वजनिक नहीं करता था और इस तरह वह उस व्यक्ति का विश्वास पात्र हो जाता था जिसके लिये वह खत लिखने का काम करता था1 अब न तो लोग पोस्टकार्डों का इस्तेमाल करते हैं और न ही आज के दौर में लोग किसी से अपनी चिट्ठी पढवाते हैं1 शायद इसलिए अब खत लिख दे सावरियां के नाम बाबू जैसा गाना भी नहीं बजता है1

रविवार, 3 अक्टूबर 2010

चार बहनें एक जैसी

ब्रिटेन की ये एक जैसी चार बहनें अपनी टीचर्स के लिए सिरदर्द बन गई हैं। बैडफोर्ड शायर के बिगलवेड के रहने वाले जोंस और जूली चाल्र्स एक साथ जन्मी इन चार बहनों के माता-पिता हैं। सितंबर 2005 में जन्मी इन चार जुड़वां बहनों की शक्ल-सूरत बिलकुल एक जैसी है। अब ये स्कूल जाने लगी हैं और इनकी टीचर्स के लिए चारों के बीच अंतर करना टेढ़ी-खीर साबित हो रहा है।
पांच साल की हो चुकी एली, जिऑर्जिना, जेसिका और हॉली ब्रिटेन में एकमात्र इस तरह की जीवित मिसाल हैं। दुनिया में क्वाड्रीप्लेट्स पैदा होने वाले बच्चों का यह 27वां इत्तेफाक है।
इन बच्चों की 42 वर्षीय मां जूली बताती हैं कि इन बच्चों की बचने की उम्मीद कम थी। डॉक्टर उन्हें बाकी बच्चों का बचाने के लिए एक का गर्भपात करने की सलाह दे रहे थे। फिर भी पति-पत्नी ने हिम्मत नहीं हारी और इसका नतीजा भी उनके पक्ष में गया।
इसी सप्ताह चारों ने स्कूल जाना शुरू किया है। चारों की पहचान करने के लिए टीचर्स ने उनके नाम का पहला अक्षर उनकी कॉलर पर लिख दिया है। चारों एक साथ यूनिफॉर्म पहनकर जाती हैं तो उन्हें पहचानना और मुश्किल हो जाता है। उन्हें देखने के लिए लोग खासतौर पर वहां आते हैं। जूली कहती हैं कि इनके जन्म के बाद से हमारी जिंदगी बदल गई है। इनकी परवरिश ही हमारे लिए सबकुछ है।

शनिवार, 2 अक्टूबर 2010

ट्रैफ़िक नियम तोड़ने पर फ़िल्म देखने की सज़ा

अगर ट्रैफ़िक के नियम तोड़ने पर आपको जुर्माना भरने के बजाय दो घंटे फ़िल्म देखने की सज़ा मिले तो कैसा होगा? जिन्होंने अब तक ये सज़ा भुगती है, उन्होंने कम से कम ट्रैफ़िक के नियम तोड़ कर भविष्य  में ऐसी फ़िल्म देखने से तो तौबा कर ली है.
असल में ट्रैफ़िक के नियम तोड़ने वालों से परेशान छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर  के यातायात विभाग ने ऐसे लोगों से निपटने का एक अनूठा तरीका अपनाया है. राजधानी रायपुर में अब ट्रैफ़िक के नियम तोड़ने वालों को पूरे दो घंटे तक थाने में बैठकर यातायात के नियमों पर आधारित फ़िल्म देखनी पड़ रही है.
यातायात पुलिस अपने इस फ़िल्म अभियान से खुश है. आम जनता भी मान रही है कि ये अभियान अगर ईमानदारी से चले तो ट्रैफ़िक नियमों की अनदेखी करने वाले लोग ज़रुर सुधर जायेंगे. लगभग दस साल पहले छत्तीसगढ़ की राजधानी बने रायपुर में ट्रैफ़िक नियमों के पालन करने को लेकर आम जनता में जागरुकता तो बढ़ी है लेकिन नियम तोड़ने वाले लोगों की संख्या में भी कोई कमी नहीं आई है.
साल 2008 में यातायात नियमों का उल्लंघन करने वाले 54 हज़ार से अधिक लोगों के खिलाफ कार्रवाई की गई और उनसे जुर्माना वसूला गया. यह आँकड़ा 2009 में भी कम नहीं हुआ. साल 2010 में तो केवल जुलाई तक लगभग 55 हज़ार लोगों के खिलाफ यातायात के नियम तोड़ने के आरोप में कार्रवाई की जा चुकी थी.
ट्रैफ़िक नियम तोड़ने वालों के खिलाफ जब चालान और जुर्माने से भी बात नहीं बनी तो यातायात पुलिस ने शहर के कुछ बुद्धिजीवियों और मनोवैज्ञानिकों से बात की. बैठकों के दौर चले और फिर शुरु हुआ ट्रैफ़िक नियम तोड़ने वालों को थाने में जबरदस्ती दो घंटे तक बैठाकर यातायात पर आधारित फ़िल्म दिखाने का यह अनूठा प्रयोग.
इसके लिए दिल्ली समेत अलग-अलग राज्यों से यातायात नियमों को लेकर बनाई गई फ़िल्में मंगाई गईं. रायपुर के ट्रैफ़िक डीएसपी बलराम हिरवानी बताते हैं, "इसकी प्रेरणा हमें आंध्र प्रदेश  से मिली, जहाँ इससे मिलती-जुलती पहल की गई थी. रायपुर में हमें इसके सकारात्मक परिणाम मिल रहे हैं और पहले ही दिन कोई 150 लोगों को यह फ़िल्म दिखाई गई."
उनका मानना है कि अगर कोई व्यक्ति किसी जरुरी काम से जा रहा हो और ट्रैफ़िक के नियम तोड़ने की सज़ा के तौर पर उसे पूरे दो घंटे थाने में बैठा कर फ़िल्म दिखाई जाये तो कम से कम अपना समय बचाने के लिये भविष्य में वह ट्रैफ़िक नियमों को तोड़ने से बाज आएगा.
मैनेजमेंट के छात्र  पंकज कुमार हड़बड़ी में थे और सिग्नल की परवाह किये बिना जब उन्होंने ग़लत तरीके से अपनी बाईक आगे बढ़ा ली तो उन्हें यातायात विभाग के सिपाही ने धर दबोचा.
दो घंटे की फ़िल्म देख कर निकले पंकज कहते हैं- " आधे मिनट का समय बचाने के चक्कर में मेरे दो घंटे बर्बाद हो गये. घर के ढेरों काम धरे रह गये. यह सज़ा किसी भी चालान, जुर्माने और सज़ा से भारी है और मुझे तो कम से कम पूरी ज़िंदगी याद रहेगी."
यातायात पुलिस से पकड़े जाने पर अधिकाँश लोग दो घंटे तक फ़िल्म देखने के बजाय जुर्माना देना बेहतर समझते हैं लेकिन यातायात पुलिस इस बात के लिए तैयार नहीं होती. फ़िल्म देखने वाले कक्ष में बैठे पारस पाठक का मानना है कि अगर इस योजना को ईमानदारी से लागू किया जाये तो लोगों में इसका गहरा प्रभाव पड़ेगा लेकिन पारस मानते हैं कि इस तरह की योजनाएँ लंबे समय तक शायद ही चल पाएँ.
असल में यातायात पुलिस में कर्मचारियों की संख्या कम होने के कारण यह योजना रायपुर के कुछ चुनिंदा इलाकों में ही लागू हो पाई है. ट्रैफ़िक नियम तोड़ने वालों को फ़िल्म प्रदर्शन करने वाले स्थल तक हर बार लाने के लिये भी यातायात पुलिस के पास कोई अमला नहीं है. ऐसे में इस अनूठी सज़ा के लंबे समय तक जारी रहने पर शक वाजिब है.
फिलहाल योजना बनाई जा रही है कि रायपुर शहर की यातायात व्यवस्था को केंद्र में रखकर एक फ़िल्म बनाई जाये और सज़ा के बतौर दिखाने के अलावा स्कूल-कॉलेज और दूसरे माध्यमों से इसे अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाया जाये.

बुधवार, 29 सितंबर 2010

7 स्थल जहाँ विचारों को मिलती है "स्वतंत्रता"

india-flag
स्वतंत्रता के 60 से अधिक वर्ष गुजर जाने के बाद आम आदमी के लिए अपनी बात कहने के स्वतंत्र माध्यम कितने है? लोकतंत्र का चौथा खंभा कहे जाने वाले कथित जन जागरण के माध्यमों जैसे कि अखबारों और टीवी समाचार चैनलों को अब लोगों की आवाज नहीं कहा जा सकता है.

तो क्या आज "वाणी स्वतंत्रता" जैसी बातें मात्र "किताबी" रह गई हैं? सौभाग्य से ऐसा नहीं है. आज भी कम से कम 7 ऐसे माध्यम अथवा जगहें उपलब्ध हैं जहाँ पर आप खुलकर अपने मन की बात रखते हैं. बस इस और कभी हमारा ध्यान नहीं जाता!

ये वे स्थान है जहाँ एक भारतवासी मुखर हो कर अपनी बात रखता है और बहस करता है. सोच कर देखिए -

कटिंग चाय की केटली
teastall
आम से लेकर खास आदमी तक इस पेय को चाव से पीता है - इसे चाय कहते हैं. और एक कटिंग चाय की प्याली उपलब्ध करवाती है सडक के किनारे लगी केटली. केटली जहाँ मात्र चाय ही नहीं पी जाती है बल्कि क्रिकेट से लेकर विदेशनीति तक के विषयों पर खुलकर बहस होती है और मुद्दों की चीरफाड़ आम बात है.


ब्लॉग
blogging
सम्पादकों की कैंची से मुक्त और प्रकाशक की पसंद से स्वतंत्र है यह माध्यम. यह आपका अपना अखबार भी है और डायरी भी. बस मन की बात लिखते जाइए और अब भारतीय अपनी बात बहुत ही मुखरता से रख भी रहे है. नहीं मात्र अंग्रेजी में नहीं, बल्कि हर भाषा में.


ट्विटर
twitter
और ब्लॉग का संक्षिप्त स्वरूप है ट्विटर रूपी माइक्रोब्लॉग. और ब्लॉग से कहीं अधिक शक्तिशाली भी. शक्तिशाली इसलिए क्योंकि आपकी कही बात तुरंत आपके पाठक तक पहुँचती है चाहे वह अपने पीसी के पास हो या ना होगा. क्या नेता क्या अभिनेता आज हर कोई इस माध्यम को अपना रहा है. भारतीयों का ट्विटर पर चहकना जारी है. परंतु फिर भी आज ट्विटर का इस्तेमाल करने वाले देशों की सूचि में हम 8वें स्थान पर हैं.


दीवारें
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स्वीकार करते हैं कि यह एक गलत तरीका है, मगर अभिव्यक्ति का माध्यम तो फिर भी है ही. दीवारें ना-ना प्रकार के विज्ञापनों से ही नहीं, संदेशों से भी रंगी जा रही है और शायद यह सिलसिला जारी रहेगा.


कार्टून
cartoon
प्रिंट मीडिया पर भले ही पक्षपात व खबरें बेचने का आरोप लगता हो या अखबारों व टीवी चैनलों की विश्वसनियता बुरी तरह से गिरी हो परंतु कार्टून अभी भी अपनी धार बनाए हुए है अतः आम भारतीय खूद को उनसे जोड़ पा रहा है.


एसएमएस
sms
एक मोबाइल से दूसरे मोबाइल तक मामूली कीमत चुका कर प्रेषित होने वाले लघु संदेश सुचनाएं ही नहीं पहुँचा रहे है, वे विचारों को फैलाने का काम भी कर रहे हैं. यकीन ना हो तो अपना मोबाइल खंगाल लें. आपके किसी मित्र ने "अफज़ल" या "राम सेना" से संबंधित कोई संदेश अग्रेषित किया होगा.


सोश्यल नेटवर्किंग साइटें
social-networking
फेसबुक, ओर्कुट, मायस्पेस, यूट्यूब... सूचि लम्बी है. सोश्यल नेटवर्किंग साइटें ना केवल मित्रों को और दूर बैठे रिश्तेदारों को आपस में जोड़ती है बल्कि ये साइटॆं विचारों को फैलाने और बहस करने का माध्यम भी बनती जा रही है. आज यहाँ रोज तस्वीरें, वीडियो, कडियाँ आदि पोस्ट की जाती है. लोग बहस करते हैं. लडाईयाँ भी होती है पर विचारों का रैला चलता रहता है.

आदमी को खिलाया कुत्ते का खाना

अफवाह फैलाने वाले शख्स को महिला ने कुत्ते का खाना खिलाया कुर्सी से बांध कर एक व्यक्ति को जबरन कुत्ते का आहार खिलाने और उस पर केरोसीन छिड़कने वाली एक युवती को यहां की एक अदालत सजा सुनाने वाली है। इस युवती को लगता था कि यह व्यक्ति उसके खिलाफ अफवाहें फैला रहा है।
बहरहाल, इस युवती को आस्ट्रेलिया की एक अदालत इस मामले में सजा सुनाने वाली है। जार्जिया बकनेल (18) पर पीड़ित व्यक्ति को चाकू दिखा कर भयभीत करने, जमीन पर लिटाने तथा केरोसीन छिड़कने के आरोप लगाये गये हैं। एएपी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ’’युवती ने उसे एक कुर्सी से बांध दिया और उसे चम्मच से कुत्ते का आहार खिलाया। ’’इसे कुत्ते खाते हैं... खाआ॓ इसे।’’
 पीड़ित व्यक्ति के सिर के पिछले हिस्से पर उसने चाकू  की मूठ से प्रहार भी किया। जार्जिया ने पिछले साल 19 नवंबर को तड़के लगभग दो बजे अपने कुछ दोस्तों के साथ इस व्यक्ति के घर जा कर उसके साथ यह अमानवीय सलूक किया था।

भारत में रोजाना 1800 से 1900 कन्या भ्रूण हत्या

पुरूषों के मुकाबले भारत में लगातार महिलाओं की कम होती संख्या के कारण पैदा हो रही कई किस्म की नृशंस सामाजिक विकृतियों के बीच भारत सरकार ने स्वीकार किया है कि 2001-05 के दौरान रोजाना करीब 1800-1900 कन्या भ्रूण की हत्याएं हुई हैं।
केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसआ॓) की एक रपट में कहा गया है कि साल 2001-05 के बीच करीब 6,82,000 कन्या भ्रूण की हत्या हुई है अर्थात इन चार सालों में रोजाना 1800 से 1900 कन्या भ्रूण की हत्या हुई है।
हालांकि महिलाओं से जुड़ी समस्या पर काम कर रही संस्था सेंटर फार सोशल रिसर्च की निदेशक रंजना कुमारी का कहना है कि यह आंकड़ा भयानक है लेकिन वास्तविक तस्वीर इससे भी अधिक डरावनी हो सकती है। गैरकानूनी और छुपे तौर पर और कुछ इलाकों में तो जिस तादाद में कन्या  भ्रूण  की हत्या हो रही है उसके अनुपात में यह आंकड़ा कम लगता है। हालांकि आधिकारिक आंकड़े इतने भयावह हैं तो इससे इसका अंदाजा तो लगाया जा सकता है कि समस्या कितनी गंभीर है।
इधर सरकारी रपट में कहा गया है कि 0-6 साल के बच्चों का लिंग अनुपात सिर्फ कन्या भ्रूण के गर्भपात के कारण ही प्रभावित नहीं हुआ बल्कि इसकी वजह कन्या मृत्यु दर का अधिक होना भी है। बच्चियों की देखभाल ठीक तरीके से न होने के कारण उनकी मृत्यु दर अधिक है। इसलिए जन्म के समय मृत्यु दर एक महत्वपूर्ण संकेतक है जिस पर ध्यान देने की जरूरत है।
रपट के मुताबिक 1981 में 0-6 साल के बच्चों का लिंग अनुपात 1981 में 962 था जो 1991 में घटकर 945 हो गया और 2001 में यह 927 रह गया है। इसका श्रेय मुख्य तौर पर देश के कुछ भागों में हुई कन्या भ्रूणकी हत्या को जाता है।उल्लेखनीय 1995 में बने जन्म पूर्व नैदानिक अधिनियम :प्री नेटल डायग्नास्टिक एक्ट, 1995 के मुताबिक बच्चे के लिंग का पता लगाना गैर कानूनी है जबकि इसका उल्लंघन सबसे अधिक होता है।
 भारत सरकार ने 2011-12 तक बच्चों का लिंग अनुपात 935 और 2016-17 तक इसे बढ़ा कर 950 करने लक्ष्य रखा है। देश के 328 जिलों में बच्चों का लिंग अनुपात 950 से कम है।
सीएसआ॓ के अध्ययन के मुताबिक सबसे बड़ी चुनौती है नियमित रूप से लिंग अनुपात पर नजर रखना जो एक उत्कृष्ट जन्म पंजीकरण प्रणाली के जरिए ही संभव है।